जबलपुर। मध्य प्रदेश में जहां सामान्य और सवर्ण वर्ग के मुद्दों पर अक्सर विरोध केवल बयानों और औपचारिक बैठकों तक सिमट कर रह जाता है, वहीं करणी सेना प्रमुख अनुराग प्रताप सिंह राघव जमीनी संघर्ष के दम पर एक प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे हैं। वे अकेले दम पर कभी मध्य प्रदेश के सात अलग-अलग जिलों के दौरे, कभी छत्तीसगढ़ में ईडब्ल्यूएस आरक्षण के नियमों के सरलीकरण की लड़ाई, तो कभी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अपने खून से पत्र लिखकर व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोलते नजर आते हैं। जबलपुर में हाल ही में उनके नेतृत्व में आयोजित विशाल मशाल यात्रा के दौरान जिस तरह से जनसमर्थन उमड़ा, उसने यह साफ संकेत दिया है कि वे आज प्रदेश में सामान्य वर्ग के हितों के सबसे सक्रिय और मुखर पैरोकार बन चुके हैं।
जबलपुर में कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को संबोधित करते हुए अनुराग प्रताप सिंह राघव का एक बेहद संवेदनशील और भावुक पहलू भी सामने आया। उन्होंने भरे मंच से कहा कि जो अमूल्य समय उन्हें अपने बूढ़े माता-पिता, पत्नी और छोटे बच्चों के बीच बिताना चाहिए था, वह सारा समय उन्होंने समाज के मान-सम्मान और हक-अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया है। उन्होंने कहा कि वे निजी सुख-सुविधाओं और पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर रहकर केवल इसलिए दर-दर भटक रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ी के साथ किसी भी स्तर पर अन्याय न हो। उनके इस भावुक उद्बोधन ने सभा में मौजूद युवाओं और बुजुर्गों को गहराई से झकझोर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अनुराग प्रताप सिंह की कार्यशैली उन्हें पारंपरिक नेताओं से अलग करती है। वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर प्रेस नोट जारी करने के बजाय सीधे सड़कों पर उतरकर व्यवस्था को चुनौती देने के लिए जाने जाते हैं। मध्य प्रदेश के मालवा, महाकौशल और बुंदेलखंड अंचल से लेकर छत्तीसगढ़ तक लगातार प्रवास कर उन्होंने सामान्य वर्ग के युवाओं को एक मंच पर संगठित किया है। दिल्ली में अपने खून से मांग पत्र लिखकर उन्होंने यह संदेश दिया कि वे अपने संकल्प के प्रति कितने गंभीर हैं। सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं और युवाओं की पीड़ा को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना ही उनकी प्राथमिक रणनीति रही है।
जबलपुर में मशाल यात्रा के जरिए अपनी ताकत दिखाने के बाद अनुराग प्रताप सिंह राघव ने साफ ऐलान किया है कि यह लड़ाई केवल राज्यों की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगी। वे अब केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए हजारों समर्थकों के साथ दिल्ली घेरने की रूपरेखा तैयार कर चुके हैं। उनके इस आक्रामक तेवर और लगातार सक्रियता के चलते मध्य प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में यह माना जाने लगा है कि वे सवर्ण समाज की सबसे बड़ी और प्रभावशाली आवाज के रूप में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर चुके हैं।













