Friday, September 25, 2026

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एशियन गेम्स- महिला क्रिकेट टीम ने भारत को गोल्ड दिलाया

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पश्चिम एशिया संकट के बीच विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर की जॉर्डन और मिस्र के विदेश मंत्रियों से मुलाकात

पश्चिम एशिया संकट के बीच विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर की जॉर्डन और मिस्र के विदेश मंत्रियों से मुलाकात

संयुक्त राष्ट्र। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने गुरुवार को संकटग्रस्त पश्चिम एशिया के दो अहम देशों, जॉर्डन और मिस्र के विदेश मंत्रियों से मुलाकात कर पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा की।जॉर्डन के विदेश मंत्री अयमान सफादी के साथ बैठक के बाद डॉ. जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "पश्चिम एशिया-मध्य पूर्व पर हमारी चर्चा वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण रही।" दरअसल, खाड़ी क्षेत्र के किनारे स्थित जॉर्डन, खाड़ी संघर्ष के दौरान ईरान के हमलों का शिकार हुआ और इस क्षेत्र में एक अहम भूमिका निभाता है। मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देल अत्ती के साथ अपनी बैठक को एस जयशंकर ने क्षेत्रीय घटनाक्रमों की एक उपयोगी समीक्षा बताया। भारत के मिस्र के साथ ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ संबंध रहे हैं, जो पश्चिम एशिया में एक बड़ी ताकत है। इस बीच, पश्चिम एशिया से जुड़े एक अन्य घटनाक्रम में, विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने दो राज्य समाधान को लागू करने के लिए ग्लोबल अलायंस की उच्च-स्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक्स पोस्ट में लिखा, "भारत ने दो-राज्य समाधान के लिए अपने स्पष्ट और निरंतर समर्थन की पुष्टि की। भारत का दृष्टिकोण राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ व्यावहारिक समर्थन को जोड़ता है।" सऊदी अरब ने फिलिस्तीन और इजरायल के स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्रों के रूप में शांति के साथ एक-दूसरे के बगल में मौजूद रहने वाले दो राज्य समाधान पर जोर देने के लिए आयोजित बैठक की अध्यक्षता की थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा दो राज्य समाधान के विचार का लगातार समर्थन करती रही है। इसी बीच एंटीगुआ और बारबुडा के प्रधानमंत्री गैस्टन ब्राउन से मुलाकात के दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि उन्होंने उन्हें आश्वस्त किया है कि भारत राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक (सीएचओजीएम) की सफलता के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस बैठक की मेजबानी इस साल नवंबर में एंटीगुआ और बारबुडा करेगा। उन्होंने आगे कहा, "हमारी विकास साझेदारी, क्षमता निर्माण और जलवायु परिवर्तन सहयोग आगे बढ़ रहा है।" भारत ने भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी कोष के माध्यम से एंटीगुआ को 10 लाख डॉलर की सहायता दी है, इसके अलावा तूफान में तबाह हुए अस्पताल के पुनर्निर्माण जैसे कार्यक्रमों के लिए सीधी मदद भी प्रदान की है।

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सतीश धवन : एक ऐसे वैज्ञानिक, जो बने भारत के अंतरिक्ष भविष्य के वास्तुकार

सतीश धवन : एक ऐसे वैज्ञानिक, जो बने भारत के अंतरिक्ष भविष्य के वास्तुकार

नई दिल्ली। 1920 में जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था, तब श्रीनगर में एक ऐसे शख्सियत का जन्म हुआ, जिसे नियति ने भारत के अंतरिक्ष भविष्य का वास्तुकार बनाना तय किया था। सतीश धवन का नाम तो आपने सुना होगा, लेकिन उनकी कहानी सिर्फ एक वैज्ञानिक की नहीं, एक दूरदर्शी, एक शिक्षक और एक राष्ट्र-निर्माता की कहानी है।सतीश धवन का जन्म 25 सितंबर 1920 को हुआ था। उनके पिता लाहौर में जज थे, लेकिन बेटे का मन कानून की किताबों में नहीं, हवा में उड़ने वाले सवालों में लगता था। लाहौर से उन्होंने गणित और एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। फिर अमेरिका में कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पीएचडी की। वहां उनके गाइड दुनिया के महान वैज्ञानिक थियोडोर वॉन कार्मन थे। सतीश धवन को 1950 के दशक में अमेरिका में नासा जैसी संस्था में काम करने का सुनहरा मौका, बहुत अच्छी सैलरी और आलीशान जिंदगी जीने का अवसर मिल रहा था, लेकिन 1951 में वह सब छोड़कर भारत लौट आए। उन्हें लगा कि उनका ज्ञान अमेरिका का नहीं, भारत के काम आना चाहिए। यह वह दौर था जब भारत में सुई तक आयात होती थी, और एक शख्स रॉकेट बनाने का सपना देख रहा था। वे बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) आए। एक ऐसा संस्थान जो तब मुश्किल से चल रहा था। धवन ने वहां एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग विभाग को खड़ा किया। वे सिर्फ पढ़ाते नहीं थे, वे सिखाते थे कि कैसे सोचा जाए। उनकी क्लास में फॉर्मूले से ज्यादा सवाल होते थे। वे हमेशा कहते थे कि 'किसी भी समस्या को हल करने से पहले, उसे ठीक से परिभाषित करना सीखो।' असली कहानी शुरू होती है 1972 में। डॉ. विक्रम साराभाई का असामयिक निधन हो गया। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम नेतृत्वहीन हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने सवाल था, 'इस सपने को कौन संभालेगा?' और उन्होंने सतीश धवन को बुलाया। धवन ने इसरो के अध्यक्ष का पद संभाला, लेकिन एक शर्त पर कि वे आईआईएससी में पढ़ाना नहीं छोड़ेंगे। वे हफ्ते में दो दिन बेंगलुरु में पढ़ाते थे और बाकी दिन अंतरिक्ष कार्यक्रम देखते थे। एक वैज्ञानिक जो सत्ता से नहीं, क्लासरूम से जुड़ा रहना चाहता था। देखते ही देखते उनके नेतृत्व में भारत ने वह कर दिखाया जो असंभव लगता था। 1975 में पहला उपग्रह आर्यभट्ट, 1979 में भास्कर-1 और 1980 में तीसरा उपग्रह रोहिणी आरएस-1 लॉन्च किए गए। खास तौर पर तीसरा उपग्रह भारत ने खुद के रॉकेट एसएलवी-3 से लॉन्च किया। दुनिया हैरान थी। एक देश, जिसकी साइकिल पर रॉकेट के पुर्जे ले जाने की तस्वीरें दुनिया देख चुकी थी, वह अब अंतरिक्ष क्लब में शामिल हो गया था। धवन की महानता सिर्फ सफलता में नहीं, असफलता को संभालने में थी। 10 अगस्त 1979 को जब पहला एसएलवी-3 मिशन फेल हुआ और रॉकेट बंगाल की खाड़ी में गिर गया, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूरी दुनिया के सामने सतीश धवन खुद आए। उन्होंने पूरी जिम्मेदारी ली, लेकिन जब 18 जुलाई 1980 को वही मिशन सफल हुआ, तो उन्होंने अपने युवा वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम को आगे कर दिया और कहा, "आज बात ये करेंगे।" उन्होंने श्रीहरिकोटा में लॉन्चिंग स्टेशन बनवाया, जो आज उनके नाम पर है, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र। 3 जनवरी 2002 को उनका निधन हो गया।

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बांग्लादेश की जेलों में बढ़ा मौतों का आंकड़ा: 8 महीने में 132 कैदियों की मौत, मानवाधिकारों पर उठे सवाल

बांग्लादेश की जेलों में बढ़ा मौतों का आंकड़ा: 8 महीने में 132 कैदियों की मौत, मानवाधिकारों पर उठे सवाल

ढाका। बांग्लादेश में हिरासत में मौतें बढ़ती जा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के पहले साढ़े आठ महीनों में देश भर में कम से कम 132 कैदियों की मौत हो चुकी है, जिससे भीड़भाड़ वाली जेलों, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं और आधिकारिक जवाबदेही पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।आधिकारिक बयानों और मानवाधिकार समूहों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि देश के विभिन्न हिस्सों में लगभग रोजाना कैदियों की मौत हो रही है। कुछ दिनों में तो मौतों की संख्या चार तक पहुंच गई है, जिससे स्वास्थ्य सेवा, आपातकालीन चिकित्सा उपचार और जेल की स्थितियों को लेकर चिंता बढ़ गई है। प्रेसेंजा इंटरनेशनल प्रेस एजेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश में जेल जाना सजा के तौर पर आजादी छिनने तक ही सीमित होना चाहिए, लेकिन जिन परिवारों ने अपनों को सलाखों के पीछे खोया है, उनके लिए यह सजा मौत में बदल गई है। रिपोर्ट के मुताबिक ढाका के मानवाधिकार संगठन आइन ओ सालिश केंद्र (एएसके) ने जनवरी से अगस्त के बीच 79 कैदियों की मौत दर्ज की है, जिनमें 47 विचाराधीन और 32 सजायाफ्ता कैदी थे। सबसे ज्यादा 44 मौतें अकेले ढाका डिवीजन में हुईं। मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए, प्रेसेंजा ने कहा कि केवल सितंबर के पहले 15 दिनों में ही बीमारियों के कारण कम से कम 10 कैदियों की मौत हुई, जिससे इस साल मरने वालों की कुल संख्या कम से कम 132 हो गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि हिरासत में हुई ताजा मौतों में 54 वर्षीय मोहम्मद रफीकुल इस्लाम और 60 वर्षीय अब्दुर रहीम शामिल हैं, जिनकी सोमवार को ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मौत हो गई। एक दिन पहले ढाका सेंट्रल जेल के दो कैदियों, अब्दुल बारेक और अब्दुल माबूद की भी मौत हो गई थी। रिपोर्ट में कहा गया, "अलग-अलग आंकड़े रिपोर्टिंग अवधि और स्रोतों में अंतर को दर्शाते हैं, लेकिन व्यापक पैटर्न इस सवाल को खड़ा करता है कि जब कैदी गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं तो क्या होता है, उन्हें कितनी जल्दी इलाज मिलता है और क्या उनके परिवारों को सूचित किया जाता है।" रिपोर्ट के अनुसार, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ये मामले हिरासत में हर मौत की गहन जांच की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। एएसके के वरिष्ठ समन्वयक अबू अहमद फैजुल कबीर ने प्रेसेंजा से बात करते हुए कहा, "कैदी अपनी आजादी खो सकते हैं, लेकिन वे अपनी मानवीय गरिमा और मौलिक अधिकार नहीं खोते।" कबीर ने जोर देकर कहा कि हिरासत में रखे गए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए राज्य जवाबदेह है, जिसमें विचाराधीन कैदी और सजायाफ्ता कैदी दोनों शामिल हैं। उन्होंने प्रत्येक मौत की स्वतंत्र जांच की मांग की, जिसमें चिकित्सा उपचार, सुरक्षा व्यवस्था और जेल अधिकारियों की भूमिका की जांच शामिल हो। ढाका विश्वविद्यालय के समाज कल्याण और अनुसंधान संस्थान के अपराध विज्ञानी और एसोसिएट प्रोफेसर तौहीदुल हक ने जेलों में व्यापक मानवाधिकार चिंताओं का कारण भीड़भाड़, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवा और खराब भोजन मानकों को बताया। प्रेसेंजा ने हक के हवाले से बांग्लादेशी मीडिया खबरर कागोज से बात करते हुए कहा, "इन सभी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के मुद्दे की अनदेखी की जा रही है।"

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बलूचिस्तान में 25 ऑपरेशन में 18 पाकिस्तानी जवान मारे गए: बीएलए

बलूचिस्तान में 25 ऑपरेशन में 18 पाकिस्तानी जवान मारे गए: बीएलए

क्वेटा। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने गुरुवार को पिछले कुछ दिनों में पूरे बलूचिस्तान में 25 ऑपरेशनों की जिम्मेदारी ली है। स्थानीय मीडिया की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, इस ऑपरेशन में पाकिस्तानी बलों को निशाना बनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप 18 सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए।द बलूचिस्तान पोस्ट को जारी एक बयान में बीएलए के प्रवक्ता जीयांद बलूच ने कहा कि उसके लड़ाकों ने 14 से 23 सितंबर के बीच प्रांत के कई हिस्सों में हमले किए, जिनमें पंजगुर, केच, खारान, खुजदार, मस्तुंग, वाशुक, नुश्की और अन्य क्षेत्र शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अभियानों के दौरान बीएलए ने पाकिस्तानी सैन्य काफिलों और चौकियों, निगरानी ढांचे, आपूर्ति मार्गों और जिसे समूह ने 'डेथ स्क्वॉड' बताया, उस पर हमला किया। बयान के अनुसार, बीएलए ने 22 सितंबर को क्वेटा के पास दश्त के टेरा माइल इलाके में पैदल गश्त के दौरान सेना के बम निरोधक दस्ते के सदस्यों को एक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) से निशाना बनाया। समूह ने दावा किया कि हमले में एक पाकिस्तानी जवान की मौत हो गई और एक अन्य घायल हो गया। बीएलए ने कहा कि उसी दिन लड़ाकों ने खुजदार में बागबाना पुलिस स्टेशन पर कब्जा कर लिया और वहां रखे हथियारों और उपकरणों को जब्त कर लिया। समूह ने कहा कि बाद में पुलिस एंटी-टेररिस्ट फोर्स (एटीएफ) के कर्मी, 'डेथ स्क्वॉड' के सदस्यों के साथ इलाके में घुसने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन पर हमला किया गया। उसने कहा कि कथित सशस्त्र समूह के कई सदस्य मारे गए और थानाध्यक्ष (एसएचओ) मुनीर आलम जट्टक सहित पुलिस कर्मी घायल हो गए। बीएलए के अनुसार, उसके लड़ाकों ने 20 सितंबर को नुश्की में बाईपास रोड पर शहीद बालाच खान स्टेडियम के पास पाकिस्तानी सैन्य बलों को भी निशाना बनाया, जिसमें दो जवान मारे गए और चार अन्य घायल हो गए। उसने आगे दावा किया कि बुलेदा के कोश्क इलाके में एक सैन्य चौकी पर ग्रेनेड-लॉन्चर से कई राउंड फायरिंग की गई। समूह ने कहा कि उसके लड़ाकों ने 21 सितंबर को मांड में रादिग पर कब्जा कर लिया, प्रमुख स्थानों पर नाकाबंदी की और भारी और स्वचालित हथियारों का उपयोग करके पाकिस्तानी सेना के मुख्य शिविर पर हमला किया। इससे पहले, 18 सितंबर को, उसने दावा किया था कि उसके लड़ाकों ने मांड में बलोचाबाद और बुल्लो पर कब्जा कर लिया, प्रमुख प्रवेश बिंदुओं को अवरुद्ध कर दिया, और ऑपरेशन के दौरान क्षेत्र में जनसभाओं को संबोधित किया। बीएलए ने आरोप लगाया कि बाद में पाकिस्तानी बलों ने नागरिक बस्तियों को निशाना बनाने के लिए क्वाडकॉप्टर का इस्तेमाल किया, जिसमें पांच लोग घायल हो गए, जबकि उसके लड़ाकों ने एक ड्रोन को मार गिराया। समूह ने बलूचिस्तान के संसाधनों के शोषण, कथित राज्य समर्थित सशस्त्र समूहों और पाकिस्तान की 'शोषणकारी नीतियों' के खिलाफ अपने अभियानों को जारी रखने की कसम खाई। बयान में कहा गया, "हमारे लड़ाकों द्वारा दिए गए ये बलिदान और आर्थिक नाकेबंदी की रणनीति हर मोर्चे पर कब्जा करने वाली सेना को हार का सामना करा रही है। स्वतंत्र और संप्रभु बलूचिस्तान की स्थापना होने तक पाकिस्तान के खिलाफ बीएलए का सशस्त्र संघर्ष जारी रहेगा।"

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पाकिस्तान में सियासी संकट: पीटीआई के प्रदर्शन से पहले इस्लामाबाद-रावलपिंडी सील, पेट्रोल-डीजल के दामों से जनता बेहाल

पाकिस्तान में सियासी संकट: पीटीआई के प्रदर्शन से पहले इस्लामाबाद-रावलपिंडी सील, पेट्रोल-डीजल के दामों से जनता बेहाल

इस्लामाबाद। पाकिस्तान सरकार द्वारा इस्लामाबाद और रावलपिंडी को देश के बाकी हिस्सों से अलग-थलग करना संकट से निपटने में मददगार साबित नहीं होगा, क्योंकि आर्थिक, राजनीतिक और शासन संबंधी मुद्दों के कुप्रबंधन ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार की स्थिति को पूरी तरह उजागर कर दिया है।'द फ्राइडे टाइम्स' की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान सरकार रोजाना ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी कर रही है, और पेट्रोलियम लेवी और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ जमात-ए-इस्लामी (जेआई) का विरोध मार्च पाकिस्तानी अधिकारियों पर कोई दबाव नहीं बना पाया है। कराची विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर और सामाजिक विज्ञान संकाय के पूर्व डीन मोनिस अहमर ने प्रमुख पाकिस्तानी दैनिक में लिखा, "इसी तरह सत्ता में बैठे लोग संस्थापक अध्यक्ष इमरान खान की रिहाई और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए इस्लामाबाद में पीटीआई के विरोध मार्च पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहे हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का आदेश देकर और पीटीआई के लॉन्ग मार्च और विरोध को रोकने के लिए रावलपिंडी और इस्लामाबाद में सैकड़ों कंटेनर तैनात कर अत्यधिक बल प्रयोग करने से भी नहीं हिचक रहे हैं।" उन्होंने उल्लेख किया कि भले ही कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंच गई हो, लेकिन पाकिस्तान सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमत कम नहीं की। पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो रोजाना तेल और डीजल की कीमतों की समीक्षा करता है, क्योंकि अधिकारी न तो खुद को जवाबदेह महसूस करते हैं और न ही पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी का देश की जनता पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं। अहमर ने कहा कि पाकिस्तान सरकार अपने आलीशान जीवनशैली को बनाए रखने और विदेशी व घरेलू कर्जों पर ब्याज चुकाने के लिए लोगों से अधिक से अधिक पैसा वसूलने में रुचि रखती है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के अलावा, पाकिस्तान में बिजली टैरिफ, गैस, सब्जियों, फलों, मांस, दूध, आटे और खाद्य तेल की कीमतों में भी वृद्धि देखी गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि 26वें और 27वें संशोधन पाकिस्तानी अधिकारियों को किसी भी जन-विद्रोह को कुचलने की अनुमति देते हैं, इसलिए सैन्य प्रतिष्ठान और उनके नागरिक सहयोगी मानते हैं कि आर्थिक चुनौतियों के कारण असंतोष की आवाजों को बल मिल रहा है। अहमर ने द फ्राइडे टाइम्स में लिखा कि न्यायपालिका को नियंत्रित कर लिया गया है, मीडिया को निष्क्रिय कर दिया गया, नागरिक समाज कमजोर हो गया है, और गठबंधन सहयोगियों के पास भी लोकतंत्र को बचाने की समझ नहीं है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारी बल का प्रयोग तभी तक कर पाएंगे जब तक नागरिक समाज, वकील, मीडिया और पाकिस्तान के युवा यथास्थिति के खिलाफ एक उग्र आंदोलन शुरू करने का जोखिम उठाने का फैसला नहीं कर लेते। अहमर ने जोर देकर कहा, "इस्लामाबाद और रावलपिंडी को देश के बाकी हिस्सों से अलग करना गंभीर प्रकृति के संकट को संभालने में मदद नहीं करेगा। सिर्फ राजधानी को सील करने की आर्थिक लागत ही मायने नहीं रखती, बल्कि देश की छवि भी धूमिल होगी। अगर सैन्य प्रतिष्ठान का प्रतिनिधित्व करने वाले हलकों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति से बचने के लिए कुछ मंथन चल रहा है तो इसका मतलब विवेक और रणनीतिक समझदारी का होना होगा। आखिरकार, गठबंधन सरकार ने आर्थिक, राजनीतिक और शासन संबंधी मुद्दों के कुप्रबंधन के कारण अपनी स्थिति को पूरी तरह से उजागर कर दिया है।" पाकिस्तानी मीडिया डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के 27 सितंबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले स्थानीय अधिकारियों ने इस्लामाबाद में दो महीने के लिए सभी प्रकार की सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबंध लगा दिया है। आदेश के अनुसार, इस्लामाबाद में रेड जोन सहित किसी भी सार्वजनिक स्थान पर पांच या अधिक व्यक्तियों के सभी प्रकार के जमावड़े, जुलूसों/रैलियों और प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गई है। पंजाब सरकार ने भी पूरे प्रांत में सार्वजनिक सभाओं पर 13 दिनों का प्रतिबंध लगा दिया है, अटक और रावलपिंडी में और उसके आसपास सड़कों और व्यवसायों को बंद कर दिया है और प्रांत के चार जिलों में रेंजर्स अर्धसैनिक बलों को तैनात किया है।

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