इंदौर। मध्यप्रदेश के एमपी-एमएलए कोर्ट ने आगर-मालवा जिले के बड़ौद थाने में दर्ज छह वर्ष पुराने शासकीय कार्य में बाधा और पुलिसकर्मियों को धमकाने के मामले में पूर्व विधायक एवं कांग्रेस जिला अध्यक्ष विपिन वानखेड़े सहित सभी आठ आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि केवल पुलिस अधिकारियों से बहस या तर्क-वितर्क करना शासकीय कार्य में बाधा का अपराध नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह सिद्ध होना आवश्यक है कि आरोपी ने लोक सेवक पर हमला किया हो या उसके विरुद्ध आपराधिक बल का प्रयोग किया हो।


मामला 23 नवंबर 2020 का है। अभियोजन के अनुसार तत्कालीन विधायक विपिन वानखेड़े अपने समर्थकों के साथ बड़ौद थाने पहुंचे थे, जहां पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए उन्होंने शासकीय कार्य में बाधा डाली तथा पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की और धमकी देने का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान प्रस्तुत किया था।


सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन की जांच और साक्ष्यों पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों, वीडियो फुटेज और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत वीडियो में धक्का-मुक्की या हाथापाई का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला, जबकि घटना थाना प्रभारी के कक्ष में होने का दावा किया गया था। इसके बावजूद उस कक्ष की सीसीटीवी फुटेज और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई।


न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें प्रस्तुत नहीं किया जाना अभियोजन की कहानी को संदेह के घेरे में लाता है। साथ ही, शासकीय कार्य में बाधा से जुड़े मामलों में सक्षम प्राधिकारी की लिखित शिकायत की अनिवार्यता का भी पालन नहीं किया गया। इन सभी तथ्यों को देखते हुए एमपी-एमएलए कोर्ट ने पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े समेत सभी आठ आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।