रायगढ़ /छत्तीसगढ़ (रोहित तिर्की) - केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी भारत माला परियोजना के तहत उरगा से पत्थलगांव के बीच बन रहा राष्ट्रीय महत्व का सड़क मार्ग क्षेत्र के विकास और बेहतर कनेक्टिविटी की दिशा में एक बड़ी परियोजना मानी जा रही है। इस सड़क के निर्माण से जहां आवागमन आसान होने और व्यापारिक गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर परियोजना के लिए अपनी जमीन देने वाले कुछ किसानों की समस्याएं अब भी खत्म होती नजर नहीं आ रही हैं।
किसानों का आरोप है कि उनकी जमीन भारतमाला परियोजना के लिए अधिग्रहित कर ली गई, संबंधित भूमि पर सड़क निर्माण भी हो चुका है, लेकिन मुआवजा राशि का भुगतान अब तक नहीं किया गया है। मुआवजे की उम्मीद में प्रभावित भूमि मालिक लंबे समय से राजस्व एवं संबंधित कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।
इन किसानों का कहना है कि उन्होंने अपनी जमीन परियोजना के लिए दे दी, लेकिन जमीन के बदले मिलने वाली वैधानिक मुआवजा राशि के लिए आज भी उन्हें इंतजार करना पड़ रहा है। आवेदन और दस्तावेज प्रस्तुत करने के बावजूद यदि भुगतान लंबित है, तो आखिर इसकी वजह क्या है—यह सवाल अब प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी उठ रहा है।
तीन किसानों के नाम सामने आए, जमीन से गुजर गई भारतमाला सड़क
धरमजयगढ़ क्षेत्र में ऐसे प्रभावित किसानों के उदाहरण के तौर पर तीन भूमि मालिकों के नाम सामने आए हैं, जिनकी जमीन से भारतमाला परियोजना की सड़क निकल चुकी है, लेकिन किसानों के अनुसार उन्हें अब तक मुआवजा राशि प्राप्त नहीं हुई है।
1. राजू पिता बतोराम
खसरा नंबर – 1425/3
राजू पिता बतोराम की उक्त भूमि भारतमाला परियोजना की सड़क निर्माण की जद में आने की बात सामने आई है। किसान के अनुसार जमीन परियोजना के लिए चली गई और सड़क का निर्माण भी हो गया, लेकिन इसके एवज में मिलने वाली मुआवजा राशि अब तक प्राप्त नहीं हुई है।
2. श्रीराम पिता सालिकराम
खसरा नंबर – 1425/4
श्रीराम पिता सालिकराम की भूमि भी परियोजना से प्रभावित बताई जा रही है। किसान का कहना है कि जमीन का उपयोग सड़क निर्माण के लिए हो चुका है, लेकिन मुआवजे की राशि अभी तक उनके खाते में नहीं पहुंची है।
3. चमार सिंह पिता सोनवानी
खसरा नंबर – 1425/2
चमार सिंह पिता सोनवानी की जमीन भी भारतमाला सड़क परियोजना से प्रभावित हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित खसरा नंबर की भूमि से सड़क निर्माण हुआ है, लेकिन किसान को अभी तक मुआवजा राशि प्राप्त नहीं हुई है।
इन तीनों मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और संबंधित भूमि पर सड़क निर्माण हो गया है, तो भूमि मालिकों को मुआवजा भुगतान किस स्तर पर अटका हुआ है?
जमीन गई, सड़क बन गई, लेकिन मुआवजा कब मिलेगा?
भूमि अधिग्रहण किसी भी किसान के लिए केवल जमीन का एक टुकड़ा खोना नहीं होता। खेती की जमीन उसके परिवार की आय, आजीविका और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का आधार होती है। ऐसे में जब किसी विकास परियोजना के लिए जमीन ली जाती है, तो प्रभावित भूमि मालिकों को नियमानुसार निर्धारित मुआवजा समय पर मिलना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
किसानों का कहना है कि उन्हें विकास कार्यों से कोई आपत्ति नहीं है। उनका सवाल सिर्फ इतना है कि जब उनकी जमीन परियोजना के लिए ली जा चुकी है और उस जमीन पर सड़क का निर्माण भी हो चुका है, तो उन्हें उनका वैधानिक मुआवजा कब मिलेगा?
यही सवाल अब धरमजयगढ़ क्षेत्र में चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
एक साल से अधिक समय से दफ्तरों के चक्कर?
प्रभावित किसानों के अनुसार मुआवजा प्राप्त करने के लिए वे लंबे समय से संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं। कभी दस्तावेज की जानकारी मांगी जाती है, कभी फाइल की स्थिति जानने के लिए उन्हें अधिकारियों से संपर्क करना पड़ता है। किसानों का कहना है कि इस दौरान जिम्मेदार अधिकारियों के तबादले भी होते रहे, लेकिन उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया।
किसानों की परेशानी यह है कि उन्हें स्पष्ट रूप से यह जानकारी नहीं मिल पा रही कि उनकी फाइल वर्तमान में किस स्तर पर लंबित है और भुगतान में देरी की वास्तविक वजह क्या है।
अधिकारी बदलते गए, लेकिन किसानों की फाइल आगे क्यों नहीं बढ़ी?
किसानों की शिकायतों में एक प्रमुख बात यह सामने आती है कि समय के साथ संबंधित कार्यालयों में अधिकारी बदलते रहे, लेकिन उनकी समस्या जस की तस बनी रही।
ऐसे में प्रशासन से यह स्पष्ट किए जाने की जरूरत है कि—
1).संबंधित किसानों की भूमि का अधिग्रहण कब किया गया?
2).संबंधित खसरा नंबरों को अधिग्रहण प्रक्रिया में किस आधार पर शामिल किया गया?
3).भूमि का कितना रकबा अधिग्रहित किया गया?
4).संबंधित भूमि का अवार्ड कब पारित हुआ?
5).प्रत्येक भूमि मालिक के लिए कितनी मुआवजा राशि निर्धारित की गई?
6).भुगतान के लिए आवश्यक सभी औपचारिकताएं पूरी हुई हैं या नहीं?
7).यदि पूरी हो चुकी हैं तो भुगतान क्यों लंबित है?
8).यदि कोई दस्तावेज या प्रक्रिया लंबित है तो किसान को इसकी जानकारी कब और किस माध्यम से दी गई?
9).संबंधित राशि किस स्तर पर अटकी हुई है?
इन सवालों का दस्तावेजों के आधार पर जवाब मिलना जरूरी है।
उरगा से पत्थलगांव तक पूरी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया की हो जांच
मामला केवल तीन किसानों तक सीमित है या ऐसे और भी भूमि मालिक हैं, जिन्हें जमीन अधिग्रहण के बाद मुआवजा नहीं मिला है—यह पता लगाने के लिए उरगा से पत्थलगांव तक भारतमाला परियोजना से प्रभावित सभी भूमि मालिकों की सूची की जांच की जानी चाहिए।
एक पारदर्शी सूची में प्रत्येक प्रभावित भूमि मालिक का—
नाम, पिता का नाम, गांव, खसरा नंबर, कुल रकबा, अधिग्रहित रकबा, निर्धारित मुआवजा, अवार्ड की स्थिति, भुगतान की तारीख और भुगतान की वर्तमान स्थिति
स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए।
यदि ऐसी सूची सार्वजनिक होती है तो यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि परियोजना में कुल कितनी निजी भूमि प्रभावित हुई और कितने भूमि मालिकों को भुगतान किया जा चुका है।
जिन्हें मुआवजा मिला, उनके मामलों की भी हो दस्तावेजी जांच
जांच की मांग केवल उन किसानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए जिनका मुआवजा लंबित है। जिन भूमि मालिकों को भुगतान किया जा चुका है, उनके मामलों की भी रिकॉर्ड के आधार पर जांच की जानी चाहिए।
भूमि के मूल रिकॉर्ड से लेकर अधिग्रहण रिकॉर्ड, खसरा, रकबा, अवार्ड और भुगतान विवरण का आपस में मिलान किया जाना चाहिए।
जांच में यह देखा जा सकता है कि—
भूमि रिकॉर्ड में दर्ज रकबा कितना था?
अधिग्रहित रकबा कितना था?
अवार्ड में कितनी राशि निर्धारित हुई?
भुगतान कितनी राशि का किया गया?
भुगतान किस तारीख को हुआ?
किस खाते में राशि गई?
इस तरह के दस्तावेजी मिलान से पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जा सकती है।
हजारों करोड़ की परियोजना, फिर मुआवजा भुगतान में देरी क्यों?
उरगा–पत्थलगांव सड़क परियोजना को बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट के रूप में देखा जा रहा है। परियोजना पर बड़ी धनराशि खर्च की जा रही है और सड़क निर्माण का उद्देश्य क्षेत्र को बेहतर राष्ट्रीय सड़क संपर्क से जोड़ना है।
ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि जिस परियोजना के निर्माण में इतनी बड़ी राशि खर्च की जा रही है, उसी परियोजना से प्रभावित किसी किसान को अपनी जमीन का मुआवजा पाने के लिए लंबे समय तक कार्यालयों के चक्कर क्यों लगाने पड़ रहे हैं?
यह सवाल किसी परियोजना के विरोध का नहीं, बल्कि परियोजना से प्रभावित लोगों के अधिकार और प्रशासनिक पारदर्शिता का है।
सड़क विकास जरूरी, लेकिन किसानों का हक भी उतना ही जरूरी
भारत माला जैसी परियोजनाएं देश के आर्थिक विकास और बेहतर परिवहन व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। सड़क बनने से क्षेत्र में आवागमन, व्यापार, रोजगार और अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
लेकिन विकास परियोजनाओं की सफलता केवल सड़क निर्माण पूरा होने से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि परियोजना के लिए जिन लोगों की जमीन गई, उनके अधिकारों और वैधानिक मुआवजे का क्या हुआ।
किसानों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं। वे चाहते हैं कि सरकार और संबंधित विभाग उनकी समस्या का समाधान करें और उन्हें उनकी जमीन के बदले मिलने वाली वैधानिक राशि उपलब्ध कराई जाए।
क्या मुआवजा भुगतान में कोई प्रशासनिक अड़चन है?
राजू पिता बतोराम, श्रीराम पिता सालिकराम और चमार सिंह पिता सोनवानी से जुड़े खसरा नंबर क्रमशः 1425/3, 1425/4 और 1425/2 बताए गए हैं।
इन मामलों में अब प्रशासन के सामने सबसे जरूरी काम यह स्पष्ट करना है कि संबंधित भूमि का अधिग्रहण रिकॉर्ड क्या कहता है और इन भूमि मालिकों के नाम पर मुआवजा राशि निर्धारित हुई है या नहीं।
यदि राशि निर्धारित हो चुकी है तो भुगतान क्यों नहीं हुआ?
यदि भुगतान प्रक्रिया में कोई कमी है तो वह किस स्तर पर है?
और यदि कोई विवाद या दस्तावेजी समस्या है तो प्रभावित किसानों को इसकी आधिकारिक जानकारी क्यों नहीं दी जा रही?
इन सवालों का जवाब मौखिक आश्वासन से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों के आधार पर मिलना चाहिए।
EOW या ED की जांच से पहले जरूरी है निष्पक्ष दस्तावेजी जांच
मुआवजा भुगतान में देरी को लेकर यदि भविष्य में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता के आरोप सामने आते हैं तो मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सक्षम जांच एजेंसियों की भूमिका पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन केवल मुआवजा लंबित होने के आधार पर आर्थिक अपराध शाखा या प्रवर्तन निदेशालय की जांच का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
पहले भूमि अधिग्रहण रिकॉर्ड, अवार्ड, मुआवजा निर्धारण, भुगतान रजिस्टर, बैंक भुगतान विवरण और संबंधित प्रशासनिक फाइलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि इस जांच में प्रथमदृष्टया वित्तीय अनियमितता या किसी आर्थिक अपराध के तथ्य सामने आते हैं, तभी सक्षम एजेंसी की जांच का प्रश्न गंभीर रूप से उठ सकता है।
किसानों की मांग—एक स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब
प्रभावित किसानों को अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट जानकारी चाहिए।
उनकी मांग होनी चाहिए कि संबंधित प्रशासन—
1).भारतमाला परियोजना से प्रभावित सभी भूमि मालिकों की सूची जारी करे।
2).प्रत्येक खसरा नंबर और अधिग्रहित रकबे की जानकारी सार्वजनिक करे।
3).प्रत्येक भूमि मालिक के लिए निर्धारित मुआवजा राशि स्पष्ट करे।
4).भुगतान हो चुका है तो भुगतान की तारीख और स्थिति बताए।
5).जिनका मुआवजा लंबित है, उनके लंबित रहने का कारण लिखित रूप से बताए।
6).लंबित मामलों के निराकरण के लिए समयसीमा तय करे।
7).भूमि अधिग्रहण, अवार्ड और भुगतान रिकॉर्ड का आपस में मिलान कराए।
8).शिकायत करने वाले किसानों को उनकी फाइल की वर्तमान स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराए।
सवाल बड़ा है—आखिर किसानों का मुआवजा कब मिलेगा?
उरगा से पत्थलगांव तक बन रहा भारतमाला मार्ग विकास की एक बड़ी तस्वीर पेश करता है। चौड़ी सड़क, बेहतर कनेक्टिविटी और तेज आवागमन क्षेत्र के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन इस विकास की दूसरी तस्वीर भी सामने है— ऐसे किसान जिनकी जमीन सड़क में चली गई, जमीन पर सड़क बन गई, लेकिन किसान अब भी अपने मुआवजे की प्रतीक्षा कर रहा है।
राजू पिता बतोराम, श्रीराम पिता सालिकराम और चमार सिंह पिता सोनवानी के खसरा नंबर 1425/3, 1425/4 और 1425/2 से जुड़े मामलों में यदि वास्तव में मुआवजा भुगतान लंबित है, तो संबंधित विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ तीन किसानों का नहीं है। सवाल यह है कि उरगा से पत्थलगांव तक भारतमाला परियोजना से प्रभावित कितने भूमि मालिकों को उनका पूरा वैधानिक मुआवजा मिल चुका है और कितने किसान आज भी इंतजार कर रहे हैं?
सरकार और संबंधित विभाग यदि पूरी भूमि अधिग्रहण एवं मुआवजा प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दें तो तस्वीर स्वतः साफ हो सकती है।
विकास की सड़क तभी मजबूत मानी जाएगी, जब उस सड़क के लिए जमीन देने वाले किसानों को भी उनका अधिकार और वैधानिक मुआवजा समय पर मिले।
अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि रिकॉर्ड खोलकर जवाब देने की है।














