नई दिल्ली। ईरान युद्ध के चलते वैश्विक तेल बाजार में आई उथल-पुथल का असर कच्चे तेल से ज्यादा डीजल और जेट फ्यूल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों पर पड़ सकता है। यह जानकारी गोल्डमैन सैक्स ग्रुप की एक रिपोर्ट में सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई रिफाइंड उत्पादों (जैसे डीजल और जेट फ्यूल) की कीमतों में कच्चे तेल की तुलना में ज्यादा तेजी देखी जा रही है। विश्लेषकों ने कहा कि मीडियम और हेवी क्रूड की सप्लाई में भारी बाधा आने से डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल का उत्पादन कम हो सकता है।
अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। यह संघर्ष बीते 28 फरवरी को शुरू हुआ और अब तीसरे हफ्ते में पहुंच चुका है, जिससे पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र पर असर पड़ा है।
इस संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात रुक गया है, और क्षेत्र में कई ऊर्जा ढांचे पर हमले भी हुए हैं। इससे तेल उत्पादकों को उत्पादन कम करना पड़ा है और कुछ रिफाइनरी संचालन भी रोकने पड़े हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, पहले हमलों के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में 40 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है, और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है।
हालांकि, डीजल और जेट फ्यूल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में इससे भी ज्यादा तेजी आई है। एशिया के कुछ हिस्सों में तो ईंधन की कीमतें दोगुनी तक हो गई हैं, और चीन, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने घरेलू बाजार को बचाने के लिए निर्यात सीमित कर दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट से कोई भी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। युद्ध के कारण पर्शियन गल्फ (फारस की खाड़ी) के देशों के लिए रिफाइंड उत्पादों का निर्यात करना मुश्किल हो गया है, जिससे रिफाइनरी बंद हो रही हैं और डीजल जैसे ईंधन बनाने वाले क्रूड की सप्लाई कम हो रही है।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में बताया गया कि पर्शियन गल्फ से होने वाले करीब 60 प्रतिशत कच्चे तेल का हिस्सा मीडियम और हेवी क्रूड होता है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल बनाने में किया जाता है, जिसके विकल्प भी सीमित हैं।
इस वैश्विक संकट का असर नेफ्था पर भी पड़ेगा, जो पेट्रोकेमिकल्स बनाने में इस्तेमाल होता है और कई उद्योगों के लिए जरूरी कच्चा माल है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि एशिया अपने नेफ्था का करीब 50 प्रतिशत फारस की खाड़ी क्षेत्र से पूरी करता है, जबकि यूरोप अपने 40 प्रतिशत जेट फ्यूल के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में यह संकट वैश्विक स्तर पर ईंधन सप्लाई और कीमतों पर बड़ा असर डाल सकता है।
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