अशोकनगर। मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। जिन हाथों में किताबें और खिलौने होने चाहिए थे, उस उम्र में बेटियां मां बनने को मजबूर हैं। जिला अस्पताल में महज दो दिनों के भीतर तीन नाबालिगों के प्रसव कराए गए, वहीं अकेले अक्टूबर महीने में अब तक पांच किशोरियों के मां बनने की बात सामने आ चुकी है। इस बीच, एक जुड़वां बच्चों की गर्भवती नाबालिग किशोरी पुलिस कार्रवाई की भनक लगते ही अस्पताल से गायब हो गई। इन घटनाओं ने बाल विवाह पर रोक लगाने के प्रशासनिक दावों और निगरानी तंत्र की पोल खोलकर रख दी है।


महज 2 दिन में 3 नाबालिगों के प्रसव, सिस्टम पर उठे सवाल

अशोकनगर जिला अस्पताल से प्राप्त जानकारी के अनुसार:

29 अक्टूबर: धूबोन इलाके की 15 वर्षीय किशोरी और राजपुर की एक अन्य नाबालिग ने अस्पताल में बच्चों को जन्म दिया।

30 अक्टूबर: अशोकनगर शहर की ही निवासी एक 17 वर्षीय किशोरी ने बेटी को जन्म दिया।


अक्टूबर का कुल आंकड़ा: केवल अक्टूबर महीने के भीतर कुल 5 नाबालिगों के प्रसव के मामले दर्ज किए गए हैं, जो क्षेत्र में धड़ल्ले से हो रहे बाल विवाह और कम उम्र में मातृत्व की भयावह स्थिति को उजागर करते हैं।


जुड़वां बच्चों की गर्भवती किशोरी पुलिस के डर से फरार

मामले में सबसे चौंकाने वाली घटना 26 अक्टूबर को सामने आई: एक नाबालिग किशोरी, जो जुड़वां बच्चों की गर्भवती थी, को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। प्रसव में अभी समय बाकी था। जैसे ही परिजनों को पता चला कि अस्पताल प्रबंधन ने इस नाबालिग मामले की आधिकारिक सूचना पुलिस चौकी को भेज दी है, तो पुलिस कार्रवाई और कानूनी पचड़े के डर से परिजन किशोरी को लेकर अस्पताल से भाग निकले। अब यह गंभीर जांच का विषय है कि सुरक्षा और डॉक्टरों की निगरानी के बावजूद परिजनों को किशोरी को अस्पताल से ले जाने कैसे दिया गया।


NFHS-6 की रिपोर्ट ने पहले ही दी थी भयानक चेतावनी

यह आंकड़े अचानक सामने नहीं आए हैं: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6): अगस्त माह में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, अशोकनगर जिले में 20 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की 24.7 प्रतिशत महिलाएं ऐसी पाई गईं, जिनका विवाह कानून का उल्लंघन करते हुए 18 वर्ष से कम उम्र में कर दिया गया था। इनमें से एक बड़ा वर्ग ऐसी युवतियों का था, जिन्हें किशोरावस्था में ही मातृत्व का दर्द झेलना पड़ा।


जिम्मेदार अधिकारियों के बयान और लीपापोती का आरोप

अस्पताल प्रबंधन ने सभी मामलों की सूचना पुलिस चौकी को दी है। वहीं, महिला एवं बाल विकास विभाग आधार कार्ड में जन्मतिथि गलत होने का बहाना बना रहा है, जिससे प्रशासनिक नाकामी पर पर्दा डालने की आशंका जताई जा रही है।


  • डॉ. बीएल टैगोर (सिविल सर्जन, जिला अस्पताल अशोकनगर): "हर माह नाबालिगों के प्रसव के इक्का-दुक्का मामले आ जाते हैं। अक्टूबर माह में पांच नाबालिगों का प्रसव हुआ है। एक नाबालिग तो जुड़वां बच्चों की गर्भवती थी, हालांकि उसके प्रसव में समय था। लेकिन, जब पुलिस को सूचना दी तो पुलिस की भनक लगते ही वह अस्पताल से भाग गई थी।"
  • चंद्रसेना भिड़े (डीपीओ, महिला एवं बाल विकास विभाग): "मुझे जानकारी मिली थी। पता चला है कि उनके आधार कार्डों में जन्म तिथि गलत है। यह नाबालिगों से जुड़ा मामला है, इसलिए इसकी जानकारी नहीं दे सकते हैं। यह मामला पूर्ण गोपनीय है।"


क्या कागजी गलती या सिस्टम की नाकामी पर पर्दा?

प्रशासन द्वारा 'आधार कार्ड में गड़बड़ी' का तर्क दिए जाने के बाद बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या यह सचमुच तकनीकी गलती है या बाल विवाह के कुचक्र को छिपाने की कोशिश? जब तक पुलिस निष्पक्ष जांच कर वास्तविक उम्र और विवाह की स्थिति की पुष्टि नहीं करती, तब तक इन मासूमों का बचपन दांव पर लगाने वालों पर शिकंजा नहीं कसा जा सकेगा।