नई दिल्ली। समायरा राघव महिला प्रीमियर लीग (डब्ल्यूपीएल) का ऑक्शन नहीं देखना चाहती थीं। उनके माता-पिता ने भी उन्हें ऑक्शन की लाइव कवरेज देखने से मना कर दिया था। उन्हें डर था कि अगर किसी भी टीम ने समायरा को अपने साथ नहीं जोड़ा, तो 16 साल की उम्र में उनके लिए निराशा को संभालना मुश्किल हो सकता है।ऑक्शन से एक दिन पहले समायरा को बड़ी खुशखबरी मिली थी। उन्हें आखिरी समय में ऑक्शन पूल में शामिल किए गए चार खिलाड़ियों में जगह मिली, जिससे कुल खिलाड़ियों की संख्या 146 से बढ़कर 150 हो गई। समायरा को इसकी जानकारी सबसे पहले इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए मिली, जिसके बाद उनकी मां ने भी उन्हें यह खबर दी।
सोमवार को आईएएनएस के साथ एक खास बातचीत में समायरा ने बताया, "मेरी मां ने मुझे तुरंत मैसेज किया कि 'मुझे लगता है कि अब तुम ऑक्शन लिस्ट में आ गई हो'।"
अपना नाम आने से पांच मिनट पहले, उन्होंने बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश) के अपने होटल रूम में लाइव ऑक्शन देखना शुरू कर दिया था। वहां वह अपनी टीम 'टीम डी' की रूममेट के साथ अंडर19 विमेंस टी20 चैलेंजर्स टूर्नामेंट खेल रही हैं।
समायरा ने बताया, "मैंने अपने नाम के साथ गुजरात जायंट्स का पैडल ऊपर उठते हुए देखा, जिसके बाद मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हम दोनों ने होटल के कमरे में जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। वह पल बिल्कुल किसी सपने जैसा था।" गुजरात जायंट्स ने उन्हें उनके बेस प्राइस 10 लाख रुपए में खरीदा, लेकिन समायरा के लिए, यह उस सपने की पहली सार्वजनिक मान्यता थी, जिसकी शुरुआत नौ साल पहले हुई थी।
23 जनवरी 2010 को जन्मीं समायरा का खेलों से नाता 100 मीटर और 200 मीटर की दौड़ से शुरू हुआ, लेकिन पापा सुनील राघव चाहते थे कि समायरा दूसरे खेलों में भी हाथ आजमाएं।
सात साल की उम्र में पिता उन्हें एक क्रिकेट एकेडमी ले गए। पहले ही सेशन में फील्डिंग कराई गई, और समायरा को यह बहुत पसंद आया। इसके बाद समायरा अपनी मर्जी से एकेडमी जाने लगीं। पिता चाहते थे कि समायरा क्रिकेटर बनें।
सुनील कॉलेज के दिनों तक लेग-स्पिनर के तौर पर खेलते थे, इसके बाद अपनी पढ़ाई पर ध्यान देते हुए आईआईएम कलकत्ता से एमबीए किया। बाद में, उन्होंने अमेरिका और भारत में डॉव केमिकल्स, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज और टोटल (आर्केमा ग्लोबल) जैसी कंपनियों में टेक्नोलॉजी को आगे बढ़ाने का काम किया।
समायरा ने बताया, "मुझे लगता है कि उनकी खुद की इच्छा थी कि वे भारत के स्तर पर क्रिकेट खेलें, लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए। इसलिए, अब वे शायद मुझमें अपना सपना देखते हैं और मैं उसी दिशा में काम कर रही हूं।"
समायरा की मां, पूजा जैन ने मैकिन्से एंड कंपनी में एक दशक तक काम किया। वे वहां पार्टनर बनीं और सस्टेनेबिलिटी प्रैक्टिस को संभाला। इसके अलावा, पेन स्टेट यूनिवर्सिटी और डॉव केमिकल्स में अपनी रिसर्च के दौरान उन्हें दो अमेरिकी पेटेंट भी मिले। आज यह दंपति 'एलिमेंटरी' नाम की कंपनी चलाते हैं, जो लिथियम-आयन बैटरी की पूरी रीसाइक्लिंग प्रक्रिया (एंड-टू-एंड रीसाइक्लिंग) में माहिर है। पूजा जहां चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर हैं, वहीं सुनील चीफ टेक्निकल ऑफिसर के तौर पर काम करते हैं।
क्रिकेट में, समायरा ने शुरुआत में मुख्य रूप से एक बल्लेबाज के तौर पर खेलना शुरू किया था। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान, गुरुग्राम में उनकी हाउसिंग सोसाइटी में 'बल्लेबाजी' करना मुमकिन नहीं था, इसलिए सुनील को उनकी लेग-स्पिन स्किल्स को निखारने का समय मिल गया। पिता ही समायरा के पहले कोच थे, जिन्होंने उन्हें बुनियादी बातें सिखाईं।
जैसे-जैसे समायरा बड़ी हुईं, पिता ने खुद को थोड़ा पीछे कर लिया। समायरा ने बताया, "जब मैं थोड़ी छोटी थी, तब मैं उतनी आत्मनिर्भर नहीं थी। लेकिन कुछ वर्षों बाद, उन्होंने मुझे खुद से चीजें करने की आजादी दी। मैं मेट्रो से आती-जाती थी। तब से वे मेरे साथ तो रहे हैं, लेकिन अब वे मुझे पूरी तरह से अपने दम पर काम करने देते हैं।"
समायरा अब हौज खास स्थित 'सिटी क्रिकेट एकेडमी' में दीप्ति ध्यानी के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग लेती हैं, जो वर्तमान में दिल्ली की सीनियर महिला टीम की हेड कोच भी हैं। दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) से जुड़ी यह एकेडमी 'सॉनेट' नाम से खेलती है।
यहीं पर उनकी भूमिका बदल गई। बचपन में वह सलामी बल्लेबाज के तौर पर खेलती थीं, लेकिन सीनियर खिलाड़ियों के साथ खेलने के दौरान उन्हें बल्लेबाजी क्रम में नीचे भेज दिया गया। उनके कोचों ने उन्हें एक सलाह दी थी कि अगर उन्हें बल्लेबाजी का मौका देर से मिलता है, तो उन्हें छक्के लगाने चाहिए।
समायरा ने बताया, "उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे छक्के लगाने की कला विकसित करनी चाहिए। इसलिए, हमने इस पर काम करना शुरू कर दिया। इसके बाद, मैं मैदान पर जाकर मैच खत्म करने (फिनिश करने) का काम करने लगी। ऐसा करते समय मुझे ज्यादा दबाव महसूस नहीं होता था। इसलिए मैंने इसे अपना लिया और अब मुझे इसमें बहुत मजा आता है। पहले ज्यादातर जमीन पर शॉट खेले जाते थे, लेकिन अब, खेल पूरी तरह बदल गया है। अब खेल के फॉर्मेट छोटे हो गए हैं और हर कोई पावर-हिटिंग और छक्के लगाने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। मैंने भी सोचा कि जो ट्रेंड चल रहा है, मुझे भी उसे सीखना चाहिए। मुझे पता है कि अगर मैं छक्के लगाना सीख जाऊंगी, तो यह भविष्य में भी मेरे बहुत काम आएगा।"
भारत के दो बेहतरीन 'फिनिशर' पूर्व कप्तान एमएस धोनी और विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋचा घोष समायरा के रोल मॉडल हैं। इस साल विमेंस दिल्ली प्रीमियर लीग (डब्ल्यूडीपीएल) में यह देखने को मिला, जहां समायरा 'नॉर्थ दिल्ली स्ट्राइकर्स' की तरफ से खेलीं।
'साउथ दिल्ली सुपरस्टार्स' के खिलाफ, समायरा ने 26 गेंदों पर 32 रन बनाए और उनकी टीम को 2 रनों से जीत मिली। 'ईस्ट दिल्ली राइडर्स' के खिलाफ समायरा ने 21 गेंदों पर नाबाद 34 रन बनाए और सेकंड लास्ट गेंद पर छक्का जड़कर अपनी टीम को जीत दिलाई।
समायरा ने बताया, "हम मैच को बिल्कुल आखिरी तक ले गए (ईस्ट दिल्ली के खिलाफ)। मैंने बस यही सोचा कि अब यहां से मैं हार नहीं सकती। मुझे जीतना ही है। मैं इस मैच में यहां तक आ गई हूं। उस समय, मुझे लगा कि हमारे गेंदबाज अब बल्लेबाजी करने आ गए हैं। अब कोई ऐसा बल्लेबाज नहीं बचा था जो छक्के लगा सके। इसलिए, उस गेंद पर मुझे लगा कि हमें किसी भी तरह एक बाउंड्री चाहिए। मैंने छक्का मारने का ही फैसला किया, क्योंकि अगर मैं सिंगल लेती, तो शायद हम मैच हार जाते। ऐसा इसलिए, क्योंकि आखिरी बल्लेबाज छक्का नहीं लगा पाता। इसके बाद, मैंने बस पूरी कोशिश की। शुक्र है कि गेंद बल्ले से अच्छे से कनेक्ट हुई और सीधा छक्के के लिए चली गई।"
इस तरह के खेल की बदौलत समायरा शानदार फॉर्म में हैं। समायरा ने अंडर-19 महिला टी20 ट्रॉफी में दिल्ली के लिए खेलते हुए सात पारियों में 162 रन बनाए। इस दौरान सिर्फ तीन बार आउट हुईं।
अंडर-19 महिला टी20 चैलेंजर ट्रॉफी में, टीम ए के खिलाफ खेलते हुए टीम डी आठ ओवर के बाद 27/3 के स्कोर पर संघर्ष कर रही थी, तब समायरा क्रीज पर आईं और 44 गेंदों में 78 रन बनाए। उन्होंने छह चौके और इतने ही छक्के जड़े, जिससे टीम का स्कोर 137/6 तक पहुंच गया। टीम बी के खिलाफ, जहां 10 रन प्रति ओवर से ज्यादा की दर से रन बनाने थे, उन्होंने 12 गेंदों में नाबाद 24 रन बनाए, जिसमें दो चौके और दो छक्के शामिल थे।
इस बीच, समायरा को दो डब्ल्यूपीएल ट्रायल में हिस्सा लेने का मौका मिला, मुंबई में मुंबई इंडियंस के लिए और बेंगलुरु में गुजरात जायंट्स के लिए। मुंबई इंडियंस में केवल एक 'ओपन नेट सेशन' था, जबकि बेंगलुरु का अनुभव कुछ अलग रहा।
उन्होंने बताया, "मुंबई इंडियंस में हमारे पास एक ओपन नेट सेशन था, जहां मुझे कोचों से बात करने का खास मौका नहीं मिल पाया, लेकिन गुजरात जायंट्स के कैंप में उन्होंने मुझ पर और छक्के मारने की मेरी क्षमता पर काफी ध्यान दिया। उन्होंने मुझे बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और कुछ ऐसी बातें बताईं जिन पर मुझे काम करने की जरूरत थी। मैं अभी उन पर काम भी कर रही हूं। उन्होंने मेरी गेंदबाजी पर भी ध्यान दिया। गेंदबाजी कोच प्रवीण (तांबे) सर ने देखा कि मैं गेंदबाजी भी कर सकती हूं और मुझमें एक अच्छी गेंदबाज बनने की क्षमता है। शायद इसीलिए उन्होंने मुझे चुना है। उस कैंप का हिस्सा बनना वाकई शानदार अनुभव था।"
समायरा बताती हैं कि उनके माता-पिता को उन पर गर्व तो है, लेकिन वे इसे कभी जाहिर नहीं करते। मुझे लगता है कि वे ऐसा इसलिए नहीं दिखाते क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं मैं बहुत ज्यादा खुश न हो जाऊं और बाकी चीजों पर ध्यान देना छोड़ दूं। वे चाहते हैं कि मैं जमीन से जुड़ी रहूं, इसलिए वे हमेशा की तरह सामान्य व्यवहार करते हैं।
जब भी वह घबराहट या दबाव महसूस करती हैं, तो पेंटिंग और ड्रॉइंग करने लगती हैं। संगीत भी उन्हें शांत करता है। हर मैच से पहले, बस से उतरकर मैदान पर जाने से ठीक पहले, वह पंजाबी गायक करण औजला का गाना '52 बार्स' जरूर सुनती हैं।
समायरा के इंस्टाग्राम बायो में उनकी परिपक्व सोच झलकती है: क्रिकेट खेलना पसंद है। इसके ठीक नीचे महान खिलाड़ी राहुल द्रविड़ की एक बात लिखी है, "आप बदला लेने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान और गौरव के लिए खेलते हैं।"
अगर समायरा को अंडर-19 वर्ल्ड कप के लिए चुना जाता है, तो उन्हें डब्ल्यूपीएल से दूर जाना पड़ सकता है। लेकिन समायरा को इसमें कोई टकराव नहीं दिखता, क्योंकि यह उनके पिता के सपने को पूरा करने की दिशा में पहला कदम होगा।
उन्होंने कहा, "अगर मुझे अंडर-19 वर्ल्ड कप की टीम में जगह मिलती है, तो यह वाकई बहुत शानदार होगा। मुझे लगता है कि अगर मेरा चयन अंडर-19 वर्ल्ड कप के लिए होता है, तो देश के प्रति मेरी एक जिम्मेदारी होगी। लेकिन अभी, मैं बस यही सोच रही हूं कि मैं जहां भी जाऊं, अच्छा प्रदर्शन करती रहूं; बाकी सब भगवान देख लेंगे। मैं कड़ी मेहनत करती रहूंगी और अपने कोचों तथा साथियों से फीडबैक लेती रहूंगी कि बेहतर बनने के लिए मैं और क्या कर सकती हूं। मुझे उनसे जो भी फीडबैक मिलेगा, मैं उस पर काम करती रहूंगी। बस अपने रूटीन का पालन करूंगी, अनुशासित रहूंगी और उम्मीद है कि मैं अपने लक्ष्य तक पहुंच जाऊंगी।"
















