उज्जैन। धर्मनगरी उज्जैन में आगामी 26 सितंबर 2026 से पवित्र महालय श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) की शुरुआत होने जा रही है। इस दौरान देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपने पूर्वजों और पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और पार्वण श्राद्ध के लिए मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के तटों पर पहुंचेंगे। ज्योतिषविदों के अनुसार, इस वर्ष 60 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद श्राद्ध पक्ष में बेहद दुर्लभ ग्रह-नक्षत्रों की पुनरावृत्ति हो रही है, जिससे 16 दिनों की यह अवधि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत फलदायी मानी जा रही है।


1966 के बाद बन रहा ग्रहों का दुर्लभ संयोग; बुधादित्य और केंद्र-त्रिकोण योग

प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य अमर डिब्बेवाला के अनुसार, वर्ष 1966 के बाद 2026 में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु और शनि देव की विशेष ग्रह स्थितियों का दुर्लभ संयोग बन रहा है। महालय श्राद्ध की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा यानी शनिवार, 26 सितंबर से होगी, जिसका समापन आश्विन कृष्ण सर्वपितृ अमावस्या यानी शनिवार, 10 अक्टूबर को होगा। खास बात यह है कि इस बार श्राद्ध पक्ष का आरंभ और समापन दोनों ही शनिवार के दिन हो रहे हैं। सूर्य के कन्या राशि में गोचर के साथ बुधादित्य योग, केंद्र-त्रिकोण और एकादश भाव से जुड़े शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जिसमें किया गया तर्पण और दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है।


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10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर शनिश्चरी अमावस्या और गजछाया योग का महासंयोग

श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन यानी 10 अक्टूबर को पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या पर इस बार अत्यंत दुर्लभ 'शनिश्चरी अमावस्या' और 'गजछाया योग' का अनूठा महासंगम हो रहा है। ज्योतिष शास्त्र में गजछाया योग को पितृ दोष निवारण, पितरों के तृप्तीकरण और तीर्थ श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि इस योग में दिए गए जल और तर्पण से पितर कई वर्षों के लिए तृप्त हो जाते हैं।


तिथि क्षय के बावजूद पूरे 16 दिन रहेंगे श्राद्ध

पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष कुछ पंचांगों में पंचमी और अष्टमी तिथि के क्षय का उल्लेख मिलता है। हालांकि, ज्योतिषाचार्यों ने स्पष्ट किया है कि धर्मशास्त्रीय परंपरा और समय-चक्र के अनुसार श्राद्धों की कुल संख्या 16 ही रहेगी। धर्मशास्त्रों में समय के सूक्ष्म अंतर के आधार पर एक ही दिन दो तिथियों के श्राद्ध संपन्न कराने का स्पष्ट प्रावधान है। परिवार, गोत्र और शाखा की कुल परंपरा के अनुसार संबंधित तिथि पर विधानपूर्वक कर्मकांड आयोजित किए जाएंगे।


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रामघाट, सिद्धवट और गया कोठा पर उमड़ेगा श्रद्धालुओं का जनसैलाब

स्कंद पुराण के अवंती खंड में उल्लेखित धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन के तीन प्रमुख स्थान—रामघाट, सिद्धवट और गया कोठा—पितृ कर्म के लिए सर्वाधिक पवित्र माने गए हैं: शिप्रा तट पर स्थित इस प्राचीन वटवृक्ष को माता पार्वती द्वारा रोपित माना जाता है। स्कंद पुराण में इसे 'प्रेत शिला तीर्थ' कहा गया है, जहां पिंडदान करने से आत्माओं को मुक्ति मिलती है। मोक्षदायिनी और उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी के तट पर स्थित रामघाट पर श्राद्ध कर्म और हवन करने से जातक को पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त होती है।


श्राद्ध पक्ष के दौरान उज्जैन के इन सभी प्रमुख घाटों पर श्रद्धालुओं के भारी आगमन की संभावना को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर समितियों द्वारा सुरक्षा, स्वच्छता और कर्मकांड की सुगम व्यवस्था के लिए व्यापक तैयारियां की जा रही हैं।