प्रयागराज। पितृपक्ष शुरू होने में महज कुछ दिन बचे हैं। ऐसे में प्रयागराज का पंडा समाज अपने सदियों पुराने बही-खातों को मेंटेन करने और उन्हें सहेजने में जुट गया है।

विशाल हस्तलिखित रजिस्टरों या बही-खाते में देश के कोने कोने से आने वाले लाखों परिवारों का सदियों पुराना इतिहास दर्ज है, जिसकी मदद से तीर्थयात्रियों के पूर्वजों और वंशजों को कुछ ही मिनटों में ढूंढ लिया जाता है। आधुनिक तकनीक और कंप्यूटर के इस दौर में भी प्रयागराज के तीर्थ पुरोहित अपने इन पारंपरिक बही-खातों पर ही सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं।

इन खातों में इस्तेमाल होने वाला विशेष कागज और स्याही दशकों तक खराब नहीं होती। जब भी कोई नया श्रद्धालु अपने पितरों के श्राद्ध या तर्पण के लिए यहां पहुंचता है, तो पंडा उनके नाम, मूल निवास स्थान (गांव-शहर) और जाति-गोत्र के आधार पर उनके दादा, परदादा या उनके भी पूर्वजों के हस्ताक्षर और उनके द्वारा कराए गए अनुष्ठानों का पूरा ब्यौरा कुछ ही मिनटों में खोज निकालते हैं।

ध्रुव तिवारी के अनुसार, इन बही-खातों में कई पीढ़ियों का रिकॉर्ड होने के कारण इन्हें कानूनी तौर पर भी एक पुख्ता पारिवारिक साक्ष्य माना जाता है। कई बार पारिवारिक विवादों या वंशावली सिद्ध करने में भी ये खाते मददगार साबित होते हैं।

ध्रुव तिवारी ने कहा, "दक्षिण राज्यों समेत पूरे भारत के लोग यहां अपने पितरों का तर्पण करने के लिए आते हैं। क्षेत्र के अनुसार हम बही खाते को मेंटेन करते हैं। करीब 300 पुरानी वंशावली हमारे बही-खाते में हैं। हमारे पास जो बही-खाते हैं, उसमें लोगों के पूर्वजों का नाम है। यह रिकॉर्ड तहसील और सरकारी कार्यालयों में नहीं मिलते हैं।"

पंडा राजेश कुमार तिवारी ने आईएएनएस से कहा, "पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो रहा है। लोग श्राद्ध कार्यक्रम के लिए एक दिन पहले ही प्रयागराज पहुंचने लगते हैं। हम लोग बही यात्रियों के लिए मेंटेन करते हैं। 70 फीसदी लोगों को अपने पूर्वजों को पता नहीं होता है। ऐसे में पुराने रिकॉर्ड को नए वर्जन में तैयार करते हैं। हमारे पास 1823 संवत से लोगों के रिकॉर्ड मौजूद हैं। बही खातों को सुरक्षित रखने के लिए दवा रखते हैं और हर महीने धूप में सुखाते हैं।"

देवरिया के विजय साहू ने कहा, "प्रयागराज में पंडों द्वारा पूर्वजों का डाटा उपलब्ध करा दिया जाता है। पूर्वजों के नाम पता चलने के बाद उनका श्राद्ध कर्म करते हैं।"