नई दिल्ली। भारत को अपने 500 गीगावाट की क्लीन एनर्जी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जलवायु निवेश, अनुकूलन वित्त (अडैप्टेशन फाइनेंस), टेक्नोलॉजी सहयोग और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह जानकारी तुर्किए में होने वाली कॉप31 क्लाइमेंट समिट से पहले इंडस्ट्री चैम्बर्स की ओर से दी गई।इंडस्ट्री चैम्बर्स एसोचैम ने एक बयान में कहा कि वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड 55.29 गीगावाट की बढ़ोतरी के साथ, जुलाई 2026 तक भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता 300.5 गीगावाट तक पहुंच गई है।
बयान के अनुसार, भारत ने 2030 के लक्ष्य से पांच साल पहले ही अपनी कुल बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 54 प्रतिशत से अधिक कर ली है।
एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा, "देश ने यह साबित कर दिया है कि एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था स्वच्छ ऊर्जा को बड़े पैमाने पर अपना सकती है। भारत ने तय समय से पांच साल पहले ही अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का आधे से अधिक हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर लिया है।"
उन्होंने आगे कहा कि कॉप31 में अमल पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिसमें उद्योग जगत की मुख्य भूमिका हो।
मिंडा ने कहा कि भारत के 2030 के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। साथ ही, बैटरी स्टोरेज की मांग 2027 तक 37 गीगावाट घंटा से बढ़कर 2031-32 तक 236 गीगावाट घंटा तक पहुंचने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि स्थापित क्षमता को भरोसेमंद बिजली में बदलने के लिए ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना, स्टोरेज की व्यवस्था करना और व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक स्वच्छ ऊर्जा का होना बहुत जरूरी है।
बयान में कहा गया है कि एसोचैम प्रधानमंत्री कार्यालय, नीति आयोग और जलवायु-कार्य से जुड़े संबंधित समूहों को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। इस रिपोर्ट में जलवायु वित्त जुटाने, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन में तेजी लाने और भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को निवेश और उनके क्रियान्वयन में बदलने के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए जाएंगे।

















