नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने गुरुवार को कहा कि अक्षय या नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की उल्लेखनीय प्रगति न केवल देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देशों के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरी है।राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट एंड एक्सपो 2026 के समापन सत्र को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली क्षमता 300 गीगावाट के आंकड़े को पार कर चुकी है। उन्होंने बताया कि भारत ने 2025 में ही अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल कर लिया था, जो निर्धारित समयसीमा से पांच वर्ष पहले की उपलब्धि है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि पिछले एक दशक में देश की सौर ऊर्जा क्षमता 3 गीगावाट से भी कम स्तर से बढ़कर 170 गीगावाट से अधिक हो गई है। उन्होंने कहा कि जो सौर ऊर्जा कभी कोयला-आधारित बिजली की तुलना में कई गुना महंगी मानी जाती थी, वह आज भारत में सबसे सस्ते ऊर्जा स्रोतों में शामिल है। उनके अनुसार यह परिवर्तन दूरदर्शी नीतियों, निजी क्षेत्र की भागीदारी तथा राज्यों और नागरिकों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
उन्होंने बताया कि पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत 65 लाख से अधिक परिवार सौर ऊर्जा आंदोलन से जुड़े हैं और उन्हें सस्ती तथा स्वच्छ बिजली उपलब्ध हो रही है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) के तहत लगभग 30 लाख किसानों को लाभ मिला है। उन्होंने कहा कि सौर पंप किसानों के डीजल खर्च को कम करने के साथ-साथ उन्हें अतिरिक्त आय का अवसर भी प्रदान कर रहे हैं, जिससे वे केवल अन्नदाता ही नहीं बल्कि ऊर्जादाता भी बन रहे हैं।
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन पहलों के माध्यम से उन दूरदराज़ जनजातीय क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाई जा रही है, जहां पारंपरिक विद्युत ग्रिड बिछाना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा, "बिजली तक पहुंच लोगों के जीवन में व्यापक बदलाव लाती है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार के अवसरों का विस्तार होता है।" उन्होंने जोर देकर कहा कि ऊर्जा समाधान तैयार करते समय शहरों, गांवों और दूरस्थ बस्तियों की अलग-अलग आवश्यकताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में हो रही प्रगति का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में लगातार हो रहे विकास के कारण आने वाले वर्षों में हाइड्रोजन ऊर्जा अधिक सुलभ और किफायती बनेगी।
उन्होंने कहा कि कभी यह सवाल उठाया जाता था कि क्या भारत जैसा विकासशील और विशाल देश जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करते हुए तेज आर्थिक वृद्धि बनाए रख सकता है। लेकिन भारत ने पिछले दशक में अपनी उपलब्धियों के जरिए इन सभी आशंकाओं का जवाब दे दिया है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि बीते वर्षों की उपलब्धियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दृष्टिकोण को सही साबित किया है कि पर्यावरणीय प्रतिबद्धताएं विकास में बाधा नहीं, बल्कि विकास की प्रेरक शक्ति होती हैं। इनसे ऊर्जा पहुंच बढ़ती है, उद्योगों की लागत घटती है, रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और आयात पर निर्भरता कम होती है।
उन्होंने उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच अधिक सहयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा, "वर्ष 2040 की तकनीकें आज की प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप्स और नवाचार केंद्रों से निकलेंगी। इसलिए अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता को प्राथमिकता देना समय की मांग है।"
अक्षय ऊर्जा परिवर्तन को प्रधानमंत्री की परिकल्पना के अनुरूप एक जन आंदोलन बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इसे केवल सरकार के प्रयासों से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके लिए शिक्षकों, विद्यार्थियों, उद्यमियों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
उन्होंने आगे कहा कि जनभागीदारी से न केवल अक्षय ऊर्जा का विस्तार तेज होगा, बल्कि नए आर्थिक अवसर पैदा होंगे, रोजगार सृजित होंगे और परिवारों की समृद्धि भी बढ़ेगी। भारत की हरित ऊर्जा यात्रा इसी सामूहिक प्रयास के बल पर विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
















