एथेंस। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' (कठोर राज्य) नीति इस धारणा पर आधारित है कि विरोध या प्रतिरोध की मुख्य वजह पर्याप्त बल का इस्तेमाल न होना है।

रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत इस रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें 4 करोड़ से अधिक की आबादी, मजबूत राजनीतिक संगठन, पूरे प्रांत में सक्रिय सशस्त्र विद्रोह और अफगानिस्तान से लगी संवेदनशील सीमा शामिल हैं।

'ग्रीक सिटी टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा में महत्वपूर्ण खनिजों के दोहन की प्रक्रिया भी उम्मीद के मुताबिक आगे बढ़ने की संभावना नहीं है। इसका कारण यह है कि खनिज भंडारों का पूरा भूवैज्ञानिक आकलन अभी तक नहीं हुआ है, प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) की क्षमता सीमित है और सुरक्षा हालात लगातार बिगड़ रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि खराब होती सुरक्षा स्थिति के चलते पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान सुरक्षा अभियानों के लिए केंद्र सरकार से अधिक धन की मांग कर सकता है। साथ ही वह प्रांत के खनिज संसाधनों पर अपना नियंत्रण और मजबूत कर सकता है तथा इन संसाधनों को पश्चिमी खरीदारों को बेचने की दिशा में भी कदम बढ़ा सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस्लामाबाद ने प्रांत की खनिज संपदा पर नियंत्रण पाने के लिए चुनी हुई प्रांतीय सरकार को हटाया। उपलब्ध तथ्य इन अटकलों से भी अधिक गंभीर हैं। 11 अक्टूबर 2026 को खैबर पख्तूनख्वा में लागू की गई संवैधानिक व्यवस्था ने उस बाधा को समाप्त कर दिया, जो कम से कम 18 महीनों से प्रांत के खनिजों पर संघीय नियंत्रण को रोक रही थी।"

रिपोर्ट के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत संघीय सरकार ने, सैन्य प्रतिष्ठान के समर्थन से, आपातकालीन शक्तियां और गवर्नर शासन लागू किया। अब जहां भी संघीय और प्रांतीय कानूनों में टकराव होगा, वहां संघीय कानून प्रभावी रहेगा। साथ ही मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी को 'निवारक हिरासत' में लिया गया है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि पाकिस्तान के 18वें संवैधानिक संशोधन के तहत खनिज प्रांतीय विषय हैं, लेकिन अब प्रांत में ऐसी कोई विधानसभा नहीं है जो इस अधिकार का उपयोग कर सके। ऐसे में पश्तून राजनीतिक समूहों के बीच फैल रहा संदेह केवल एक साजिश सिद्धांत नहीं, बल्कि घटनाक्रम की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान सरकार के इस कदम के सुरक्षा संबंधी परिणाम राज्य को मिलने वाली संभावित आय से कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 की पहली छमाही में पुलिसकर्मियों की मौतों की संख्या बढ़कर 122 हो गई, जबकि एक वर्ष पहले इसी अवधि में यह आंकड़ा 63 था। वहीं जुलाई से सितंबर 2026 के बीच हिंसा से जुड़ी मौतों की संख्या 556 दर्ज की गई, जो पिछली तिमाही में 475 थी।

इस्लामाबाद ने बिगड़ती सुरक्षा स्थिति का हवाला देते हुए खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू करने का औचित्य बताया है।

हालांकि, रिपोर्ट का कहना है कि पश्तूनों के बीच वैधता रखने वाली एकमात्र निर्वाचित सरकार को हटाना, उसके मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करना और प्रांत के संसाधनों को संघीय तथा विदेशी नियंत्रण के लिए खोल देना हिंसा की इस प्रवृत्ति को नहीं रोक पाएगा।

रिपोर्ट में कहा गया है, "इससे उग्रवादी संगठनों को अपनी बात रखने के लिए एक मजबूत मुद्दा मिल जाएगा और खैबर पख्तूनख्वा में वही स्थिति पैदा हो सकती है, जिसने बलूचिस्तान को प्रशासनिक रूप से बेहद मुश्किल बना दिया था।"