सागर, स्वाति सोलंकी। सागर के तुलसीनगर वार्ड में रहने वाले 51 वर्षीय लखनलाल अहिरवार के निधन के बाद उनकी 20 साल की बेटी कविता ने समाज की पुरानी रूढ़ियों को पीछे छोड़ते हुए वह कर दिखाया, जो हर किसी की आंखें नम कर गया। मजदूरी कर बेटी को पढ़ाने वाले पिता की अचानक हार्ट अटैक से मौत हो गई। घर में कोई बेटा न होने के कारण कविता ने न सिर्फ पिता की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि मुक्तिधाम पहुंचकर मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज भी पूरी तरह निभाया।

मां का आंचल पहले ही छूटा था

कविता जब महज दो साल की थी, तभी उनकी मां मीना अहिरवार का निधन हो गया था। इसके बाद से लखनलाल ने अकेले ही मां और पिता दोनों की भूमिका निभाते हुए बेटी की परवरिश की। दिन-रात मजदूरी कर उन्होंने कविता को पढ़ाया और उसे नर्सिंग की पढ़ाई काबिल बनाया ताकि उसका भविष्य संवर सके। लेकिन एक झटके में सिर से पिता का साया भी उठ गया।

मुक्तिधाम का वह भावुक पल

देर रात अचानक तबीयत बिगड़ने पर कविता खुद अपने पिता को अस्पताल लेकर दौड़ी, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें बचाया नहीं जा सका। अंतिम संस्कार के समय जब समाज के सामने सवाल आया कि अर्थी को कंधा कौन दे, तो कविता खुद आगे आई। उसने अपने कांपते हाथों से पिता की अर्थी को कंधा दिया और नरयावली नाका मुक्तिधाम में नम आंखों से अंतिम विदाई देते हुए मुखाग्नि दी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर एक शख्स की आंखें भर आईं।

प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मदद की गुहार

इस हृदयविदारक घटना के बाद परिवार और रिश्तेदारों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि इस होनहार बेटी की आगे की पढ़ाई की मु मुकम्मल व्यवस्था की जाए और उसकी योग्यता के अनुसार नर्सिंग की नौकरी दी जाए, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।