बड़वानी। मध्य प्रदेश में इन दिनों आसमान से बरसती आग और लू (हीटवेव) के कड़े अलर्ट के बीच ग्रामीण अंचलों से पानी की किल्लत की ऐसी भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं, जो मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देने वाली हैं। ऐसा ही एक बेहद चिंताजनक और गंभीर मामला बड़वानी जिला मुख्यालय से करीब ७० किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत सेमलेट के कोट बामनी गांव से सामने आया है। एक तरफ जहां पूरा प्रदेश भीषण गर्मी की मार से बेहाल है, वहीं इस गांव के लोगों के लिए पानी की एक-एक बूंद जिंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष बन चुकी है। हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि गांव की करीब ८४० की कुल आबादी में से ५०० से अधिक लोग पिछले लंबे समय से गंभीर पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव के नन्हे-मुन्ने मासूम बच्चे और बुजुर्ग भी अपनी नींद कुर्बान कर रात के घने अंधेरे में पानी की तलाश में घरों से निकलने को मजबूर हैं।
कोट बामनी गांव में सुबह की शुरुआत सूरज की पहली किरण निकलने से बहुत पहले, आधी रात को ही हो जाती है। जब दुनिया सो रही होती है, तब यहाँ के ग्रामीण, महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे हाथों में खाली बर्तन, डिब्बे और जलते हुए टॉर्च लेकर पथरीले रास्तों पर पानी खोजने निकल पड़ते हैं। गांव के लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए रोजाना तीन से चार किलोमीटर की लंबी और थका देने वाली दूरी तय करनी पड़ती है। सुदूर जंगलों और खेतों में बने कुओं तथा छोटे प्राकृतिक जल स्रोतों पर पहुंचकर लोग पानी भरते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि वे रात ३ या ४ बजे घर से न निकलें, तो बाद में कुओं का पानी सूख जाता है या वहां इतनी भारी भीड़ जुट जाती है कि पानी मिलना पूरी तरह नामुमकिन हो जाता है। इस झुलसा देने वाली गर्मी में यह संघर्ष हर बीतते दिन के साथ और अधिक खौफनाक रूप लेता जा रहा है।
इस जल संकट ने गांव के विकास और बुनियादी ढांचे के दावों की भी पूरी तरह पोल खोलकर रख दी है। ग्रामीणों के मुताबिक गांव में सरकारी स्तर पर लगाए गए दोनों हैंडपंप पिछले कई सालों से पूरी तरह खराब और बंद पड़े हुए हैं, जिन्हें सुधारने की जहमत आज तक किसी जिम्मेदार ने नहीं उठाई। इसके अलावा गांव में जो दो प्राकृतिक कुएं मौजूद हैं, उनकी स्थिति भी बेहद दयनीय हो चुकी है। कुओं का पानी पूरी तरह दूषित हो चुका है, उसमें चारों तरफ हरी काई और गंदगी जमी हुई है। लेकिन प्यास बुझाने का कोई दूसरा साधन न होने के कारण ग्रामीण इसी गंदे और जहरीले पानी को कपड़े से छानकर पीने को मजबूर हैं। इस दूषित पानी के इस्तेमाल से गांव में संक्रामक बीमारियों और महामारी का खतरा लगातार मंडरा रहा है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों का स्वास्थ्य सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है।
इस बुनियादी समस्या को लेकर ग्रामीणों में स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है। पीड़ित ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने पानी की इस विकराल समस्या को लेकर दर्जनों बार जिला प्रशासन के अधिकारियों, जनपद पंचायत और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों से लिखित शिकायतें की हैं। कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई से लेकर संबंधित विभागों के चक्कर काटे गए, आवेदन सौंपे गए, लेकिन हर बार ग्रामीणों के हाथ सिर्फ कागजी आश्वासन ही लगे। जमीनी स्तर पर आज भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि यदि प्रशासन ने समय रहते बंद पड़े हैंडपंपों को सुधारा होता या नल-जल योजना को सुचारू किया होता, तो आज गांव के मासूम बच्चों को पढ़ाई छोड़कर रात के अंधेरे में पानी के लिए नहीं भटकना पड़ता। सुबह पानी भरने की इस मशक्कत के कारण कई बच्चे समय पर स्कूल भी नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है।
मां नर्मदा के आंचल और उसके तटीय इलाके में बसे इस जिले के ग्रामीणों का पानी के लिए इस तरह तरसना शासन के विकास के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान है। कोट बामनी गांव के थके-हारे लोग अब भी उम्मीद भरी नजरों से जिला प्रशासन की ओर देख रहे हैं। ग्रामीणों ने पुरजोर मांग की है कि गांव में तुरंत आपातकालीन स्थिति के तहत टैंकरों के माध्यम से पानी की सप्लाई बढ़ाई जाए, सालों से बंद पड़े हैंडपंपों को युद्धस्तर पर ठीक कराया जाए और गांव में पानी की स्थायी व्यवस्था के लिए नए बोरवेल या जल स्रोत तैयार किए जाएं। यदि समय रहते प्रशासन की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली, तो आने वाले नौतपा और भीषण गर्मी के दिनों में स्थिति अनियंत्रित हो सकती है।

