छतरपुर (पंकज यादव)। छतरपुर जिले में लगभग बनकर तैयार हो चुके नए शासकीय मेडिकल कॉलेज के नामकरण को लेकर जिला मुख्यालय पर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। बीते दिनों चौरसिया समाज के एक प्रतिनिधिमंडल ने महामहिम राज्यपाल और उच्च शिक्षा मंत्री को एक ज्ञापन भेजा, जिसमें इस नवनिर्मित मेडिकल कॉलेज का नाम डॉ. बी.डी. चौरसिया के नाम पर किए जाने की मांग की गई है। अब ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आ रहा है कि आ​खिर बी.डी. चौरसिया हैं कौन, जिनके नाम पर छतरपुर के मेडिकल कॉलेज का नामकरण करने की मांग की जा रही है, तो आइए जानते हैं कि कौन थे डॉ. चौरसिया और क्यों उनके बिना मेडिकल की पढ़ाई अधूरी मानी जाती है।


दुनिया भर में 'एनाटॉमी के जनक' के रूप में विख्यात दिवंगत डॉ. बी.डी. चौरसिया का पूरा नाम भगवानदीन चौरसिया था। चिकित्सा शिक्षा की रीढ़ माने जाने वाले डॉ. बी.डी. चौरसिया का जन्म 1 अक्टूबर 1937 को छतरपुर जिले के एक छोटे से कस्बे बारीगढ़ में हुआ था। उनका लालन-पालन माता राधारानी और पिता रमादीन चौरसिया के एक साधारण किसान परिवार में हुआ। ग्रामीण परिवेश से निकलकर उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 1954 में इलाहाबाद के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज से पूरी की। बचपन से ही मेधावी रहे चौरसिया ने इसके बाद चिकित्सा क्षेत्र का रुख किया। उन्होंने वर्ष 1960 में इंदौर के सुप्रसिद्ध महात्मा गांधी मेमोरियल (MGM) मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस (MBBS) की उपाधि प्राप्त की। इसके ठीक पांच साल बाद यानी 1965 में उन्होंने इसी संस्थान से शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) में मास्टर ऑफ सर्जरी (MS) की डिग्री हासिल की। उच्च शिक्षा के प्रति उनके जुनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 1975 में ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय से पीएचडी (PhD) की उपाधि भी प्राप्त की।


क्लास नोट्स से शुरू हुआ था 'ह्यूमन एनाटॉमी' की विश्वप्रसिद्ध किताब का सफर

डॉ. चौरसिया ने अपने करियर की शुरुआत एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर के एनाटॉमी विभाग में एक प्रदर्शक के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल में व्याख्याता के रूप में सेवाएं दीं। वर्ष 1968 में वे गजराराजा मेडिकल कॉलेज ग्वालियर में एनाटॉमी के रीडर के रूप में शामिल हुए और जीवन के अंतिम समय तक वहीं अध्यापन कार्य करते रहे।


ग्वालियर में पढ़ाते समय मानव मस्तिष्क और शरीर रचना पर उनके द्वारा हाथ से बनाए गए चित्र और क्लास नोट्स मेडिकल छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए थे। उस दौर में फोटोकॉपी और टाइपिंग काफी महंगी हुआ करती थी। गरीब और जरूरतमंद छात्रों तक शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए डॉ. चौरसिया अपने नोट्स को खुद साइक्लोस्टाइल (मशीन से प्रिंट) करते थे और महज ₹10 की लागत मूल्य पर छात्रों को बांट देते थे। उनके इन बेहतरीन और सरल नोट्स की ख्याति जब नई दिल्ली के सीबीएस पब्लिशर्स तक पहुंची, तो उन्होंने डॉ. चौरसिया को मानव शरीर रचना विज्ञान पर एक विस्तृत पाठ्यपुस्तक लिखने के लिए आमंत्रित किया।


45 वर्षों से दुनिया भर के डॉक्टरों की पढ़ाई का आधार बनी हैं पुस्तकें

प्रोफेसर इंदरबीर सिंह और प्रोफेसर एस.सी. गुप्ता जैसे विद्वानों से प्रेरित होकर डॉ. चौरसिया ने वर्ष 1979 में अपनी पहली ऐतिहासिक पुस्तक ह्यूमन एनाटॉमी (Human Anatomy) प्रकाशित की। उन्होंने इस गंभीर और जटिल विषय को रोचक बनाने के लिए पुस्तक में पहेलियाँ, कविताएँ, सरल भाषा और आकर्षक फ्लोचार्ट शामिल किए, ताकि छात्रों को यह विषय थकाऊ और उबाऊ न लगे। उन्होंने यह अद्भुत कृति अपने गुरु उमा शंकर नागयाच को समर्पित की थी।


यह पुस्तक चिकित्सा जगत में इस कदर मील का पत्थर साबित हुई कि पिछले 45 वर्षों से भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी लाखों डॉक्टरों की पढ़ाई का यह मुख्य आधार बनी हुई है। इसके साथ ही उनकी लिखी 'हैंडबुक ऑफ जनरल एनाटॉमी' भी मेडिकल छात्रों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है। डॉ. चौरसिया ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में 60 से अधिक महत्वपूर्ण शोध पत्र भी प्रकाशित किए। चिकित्सा के क्षेत्र में उनके इसी अप्रतिम योगदान के लिए वर्ष 1982 में उन्हें प्रतिष्ठित 'नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज' का फेलो चुना गया था।


असमय मौत के बाद भी अमर है नाम

ज्ञान की साधना में लीन रहने वाले डॉ. बी.डी. चौरसिया ने कभी विवाह नहीं किया। उनका पूरा जीवन मेडिकल की शिक्षा और समाज को ही समर्पित रहा। उनके एकाकी जीवन में उनकी पालतू फीमेल डॉग 'रानी' और उनके वफादार सहायक 'मुन्ने मियां' ही उनके सबसे करीबी थे। दुर्भाग्य से, चिकित्सा जगत को इतनी ऊंचाइयों पर ले जाने वाले इस महान हस्ताक्षर का 5 मई 1985 को महज 47 वर्ष की अल्पायु में दिल का दौरा (मायोकार्डियल इंफार्क्शन) पड़ने के कारण असमय निधन हो गया।


चौरसिया समाज के छतरपुर जिलाध्यक्ष ब्रजेश कुमार चौरसिया और सामाजिक कार्यकर्ता मानिक चौरसिया बताते हैं कि डॉ. बी.डी. चौरसिया का चिकित्सा जगत में वही स्थान है जो विज्ञान में न्यूटन या आइंस्टीन का है। भले ही आज डॉ. चौरसिया हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी लिखी पुस्तकें आज भी दंत चिकित्सा, फिजियोथेरेपी और व्यावसायिक चिकित्सा सहित विभिन्न चिकित्सा विधाओं के छात्रों के लिए उतनी ही प्रासंगिक हैं। चौरसिया समाज और छतरपुर के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि जिस महान विभूति की किताबों को पढ़े बिना दुनिया का कोई भी छात्र डॉक्टर नहीं बन सकता, उनके गृह जिले छतरपुर के मेडिकल कॉलेज का नाम 'डॉ. बी.डी. चौरसिया मेडिकल कॉलेज' रखा जाना समूचे बुंदेलखंड के लिए परम गौरव की बात होगी।